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प्रिये का ankiyans version

  अंकु ठाकुर मैम की सुबह पोस्ट की गई रचना की आगे की श्रृंखला। इस रचना में जिन किरदारों के संदर्भ लिए गए वो सब अंकु मैम द्वारा समय समय पर रचे गए किरदारों के नाम हैं। तुम ओजे की हो flying किक मैं संहिती का ताज़ा कमेंट तुम हो दानव के तेवर से मैं सर्वम का दिमाग प्रिये तुम वीरा के हो hacking skill मैं वी की सी हूं तेज़ी तुम हो ओया का planet तो मैं हूं धरती का सारांश तुम आर्या के हो पैंतरे मैं अभव का अंदाज़ तुम यश का हो determination मैं सर्वज्ञ के सारे राज़ तुम हो आरिया का पागलपन मैं अथक का hidden love तुम शेरा की हो बहादुरी मैं अरि का अटूट विश्वास तुम अंकु  जी की हर रचना मैं AANKIYANS का एक हिस्सा रात भर भी सुनाती रहूं तब भी न पूरे ये किस्सा लास्ट  लाइन esp. for अंकु मैम तुम BTS के गाने हो और मैं हूं जैसे AARMY चलती रहे ये तुकबंदी चाहे जो बोले ज़माना हम purple वाला heart हैं तो तुम खरगोश टमाटर की दोस्ती इन बड़े बड़े किरदारों के सामने अपनी है क्या ही हस्ती

आधुनिका अध्याय 12 तुम्हारे लिए

                           शिरीष का फोन काटने के बाद वनिता को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे। वो चाहती तो उसे धूल में मिला सकती थी। उसकी नौकरी और प्रतिष्ठा को चोट पहुंचा सकती थी। एक शिकायत करके उसके इस खोखले दावे की हवा निकाल सकती थी कि वनिता उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। पर वो शिरीष को बेहद प्यार करती थी इसलिए उसने एक आखिरी कोशिश करने का निश्चय किया। वो शिरीष के घर पहुंच गई। ' प्रणाम मां।' वनिता को अपने घर आया देख कर शिरीष चौंक गया। ' प्लीज बैठिए। आपसे कुछ बात करनी है।' 'मां मेरा नाम वनिता है। मैं शिरीष के साथ काम करती हूं। ' ' हाँ, बताया था उसने तुम्हारे बारे में।' ' मां मैं जो कहने जा रही हूं शायद आपको मेरी बेअदबी लगे लेकिन मेरे पास अब और कोई रास्ता नहीं है। मैं और शिरीष एक दूसरे को पसंद करते हैं. शादी भी करना चाहते हैं।पर शिरीष के लिए आपकी इच्छा ही सब कुछ है माँ। मैं जानती हूं आपने मेरे बारे  में अच्छी बातें नहीं सुनी। पर सच ये है कि वो सब लोगों की ईर्ष्या में लगाई हुई आग है। मैं असलियत में वैसी नहीं ह...

आधुनिका अध्याय 12 दिशाहीन

मेरे प्रिय साथियों क्या लिखूँ?  इस कहानी के दो अंत हो सकते हैं. एक वो जो हक़ीक़त में हुआ था और एक रोमांटिक सा कहानीकार की सुखद कल्पना में डूबा। मेरी दोस्त ने कहा था सच्चाई लिखो। पर मैं चाहती हूं वनिता और उसके जैसी हज़ारों लाखों लड़कियों के मन में एक उम्मीद जगाना। इसलिए मैं दोनों लिखती हूँ.. आपको जो पसंद आए स्वीकार कर लीजिए। पर मुझे ज़रूर बताइएगा आपको कौन सा ज्यादा पसंद आया।                             आज शिरीष फिर बस स्टॉप पर खड़ा था। आज भी वही बारिश थी और वही वनिता की कार। बस अंतर इतना था कि आज वनिता ने हंस कर उसे hello नहीं कहा। न ही उसके लिए गाड़ी रोकी और न उसे घर छोड़ने को कहा। अनायास ही वनिता से हुई अंतिम मुलाकात उसकी आंखों के आगे आ गई... वनिता हाथ में शिरीष की शादी का card लिए हाथ जोड़े उसकी मां के आगे विनती सी कर रही थी। माँ प्लीज ऐसा मत कीजिए। मैं आपके बेटे को बेहद प्यार करती हूं।' 'जो कुछ भी हुआ उसमें गलती तुम्हारी ही है। इतने साल उसके साथ घूमने फिरने से पहले एक बार पूछ तो लेती कि तुम जैसी लड़की के साथ ...

अध्याय 11 मैं हूँ न

                              वनिता की ज़िंदगी में शिरीष की जगह और अहमियत दोनों बढ़ते जा रहे थे। ऑफिस में भी सभी शिरीष के प्रति वनिता के आदर और लगाव को महसूस कर सकते थे। वो जहां भी जाती दबी जुबान में लोग उसके और शिरीष के बारे में चर्चा किया करते थे। पर वनिता से सीधे कुछ भी कहने की हिम्मत शायद किसी की नहीं थी।परंतु  शिरीष गाहे बगाहे लोगों के तानों का शिकार होता जा रहा था। अजीब बात है कि हम कहने को तो अपनी निजी जिंदगी में किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करते। पर वही हम शादी और जीवनसाथी जैसे महत्वपूर्ण निर्णय में परिवार, समाज और प्रचलित मान्यताओं पर इंसान के नैसर्गिक गुणों से ज़्यादा भरोसा करते हैं। साहसी से साहसी लोग भी जाति, धर्म , उम्र और कुंडली के फेर से बच नहीं पाते। ऐसा ही शिरीष का हाल था। हर पल वनिता के साथ रहने और उसके द्वारा प्रेम, स्नेह और आदर देने के बावजूद वह वनिता से शादी करने के अपने निर्णय पर पछता रहा था। उसे इस बात की भी परवाह नहीं रही कि वनिता की छवि पर इसका क्या प्रभाव होगा। वह अपने परि...

आधुनिका अध्याय 10 बिना बाप का लड़का

वनिता और शिरीष की ज़िंदगी के तूफान थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। शिरीष की पसंद पर उसके घरवालों की सहमति की मुहर लगने में काफी अड़चनें थीं। 2 साल से शिरीष और वनिता साथ थे। अब वनिता के मन में दबी हुई आशंकाओं ने सर उठाना शुरू किया। वो शिरीष से जब भी पूछती शिरीष कोई न कोई बहाना बना कर उसे टाल देता। वनिता आज के ज़माने की लड़की थी। उसके लिए शादी कोई लेन देन या समझौता नहीं, वो बन्धन था जिसमें वो स्वेच्छा से बंधना चाहती थी। पर शिरीष आज भी समाज और परिवार की दुहाई दे रहा था। इसी बीच एक दिन वनिता के सब्र का बांध टूट गया। ' शिरीष तुम घर पर कब बात करोगे?' 'वनिता असल में आपकी उम्र...!!' 'मेरी उम्र क्या? आपको रिश्ता बनाने से पहले नहीं पता था मेरी उम्र का?' 'पता था पर मुझे एहसास नहीं था कि मेरे घरवाले इस कदर अड़ जाएंगे।' 'मनाओ उन्हें शिरीष। मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूं। तुम्हें कभी खोना नहीं चाहती। एक बार शादी हो गई फिर सब ठीक हो जाएगा।' ' कुछ ठीक नहीं होगा। मैंने आपसे शादी की तो मेरे घरवाले हमेशा के लिए मुझसे रिश्ता तोड़ लेंगे।' ' तुम कहना ...

आधुनिका अध्याय 9 : प्यार के लिए

           कॉफी का कप हाथ में लिए वनिता अतीत में खो गई। आज जो शिरीष उसे घमंडी और दिखावेबाज़ कह रहा था, उसी शिरीष ने कभी उसकी उपलब्धियों से प्रभावित होकर उसका हाथ थामने की गुजारिश की थी। वनिता सोच रही थी कि स्त्री और पुरुष के लिए कितने अलग नियम कायदे हैं। उसने कभी अपने स्त्री होने पर न तो अफसोस किया था न ही कभी इस बात को अपने राह की बेड़ी बनने दी थी। पर आज शिरीष के बदलते व्यवहार के कारण वो सोचने पर मजबूर हो गई थी। जब कोई पुरूष किसी उच्च पद को सुशोभित करता है तो कितनी आसानी से उसके विवाह के लिए रास्ते खुले होते हैं। वो अपने समकक्ष या कमतर किसी से भी आसानी से विवाह कर सकता है। बल्कि अपने से आर्थिक या सामाजिक स्तर में थोड़े निचले पावदान में रिश्ता जोड़ने पर उसकी मान प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। लेकिन वहीं स्त्री अगर अपने कैरियर में एक सम्मानजनक स्थिति में हो तो अपने से ऊंचा ही उसको देखना पड़ता है। बल्कि उसके रास्ते में ये कह कर और कांटे बिछाए जाते हैं कि कैरियर को समर्पित स्त्री में वो घरेलूपन और वो विनम्रता होती ही नहीं जो एक घर बनाने के लिए ज़रूरी है। वनिता ने नज़र...

आधुनिका अध्याय 8 हाथ जोड़ते हैं

हे ईश्वर क्या तुमने मेरी ज़िन्दगी में सफर ही सफर लिखा है, कोई मंज़िल नहीं? क्यों मुझे ऐसे ही लोग मिलते हैं मरीचिका जैसे। प्यासी क्यों नहीं मर जाती मैं इन सब के पीछे भागते भागते। न थकती हूँ न रुकती हूं। बस चलती ही जा रही हूं। बहुतों की छांव हूं मैं पर मेरी राहत कोई नहीं। एक दिन एक पल का सुकून किसी ने नहीं दिया। केवल इल्ज़ाम और ताने। जिद्द का आलम ये कि मैं मना भी कर दूं तो मेरे पास आने की ज़िद और जब मुझे आदत सी हो जाती है तो दूर जाने की ज़िद। इन ज़िदों के बीच में मेरी मासूम सी ख्वाहिशें कहाँ पनपेंगी? कुम्हला गयी हैं सारी भगवान। ये सच है कि मेरा प्यार किसी रस्मो रिवाज़ का मोहताज नहीं है। पर ये भी सच है कि किसी ने कभी इस इरादे से मेरा हाथ थामा ही नहीं। मैंने क्यों नहीं रोका? क्योंकि ये मेरा काम नहीं है, आपका है। आप जो सब कुछ देखते हैं, जानते हैं। रोकते क्यों नहीं ऐसे लोगों को मेरी ज़िंदगी में आने से ? या फिर आने के बाद मेरी ज़िंदगी से जाने से? मैंने तो सिर्फ प्यार किया था, आप ने इतनी नफरत क्यों की मुझसे? भगवान के आगे हाथ जोड़े वनिता न जाने क्या क्या कहती जा रही थी। वनिता जो समाज के सामने मज़ब...