आधुनिका अध्याय 10 बिना बाप का लड़का
वनिता और शिरीष की ज़िंदगी के तूफान थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। शिरीष की पसंद पर उसके घरवालों की सहमति की मुहर लगने में काफी अड़चनें थीं। 2 साल से शिरीष और वनिता साथ थे। अब वनिता के मन में दबी हुई आशंकाओं ने सर उठाना शुरू किया। वो शिरीष से जब भी पूछती शिरीष कोई न कोई बहाना बना कर उसे टाल देता। वनिता आज के ज़माने की लड़की थी। उसके लिए शादी कोई लेन देन या समझौता नहीं, वो बन्धन था जिसमें वो स्वेच्छा से बंधना चाहती थी। पर शिरीष आज भी समाज और परिवार की दुहाई दे रहा था। इसी बीच एक दिन वनिता के सब्र का बांध टूट गया।
' शिरीष तुम घर पर कब बात करोगे?'
'वनिता असल में आपकी उम्र...!!'
'मेरी उम्र क्या? आपको रिश्ता बनाने से पहले नहीं पता था मेरी उम्र का?'
'पता था पर मुझे एहसास नहीं था कि मेरे घरवाले इस कदर अड़ जाएंगे।'
'मनाओ उन्हें शिरीष। मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूं। तुम्हें कभी खोना नहीं चाहती। एक बार शादी हो गई फिर सब ठीक हो जाएगा।'
' कुछ ठीक नहीं होगा। मैंने आपसे शादी की तो मेरे घरवाले हमेशा के लिए मुझसे रिश्ता तोड़ लेंगे।'
' तुम कहना क्या चाहते हो? क्या अपने घरवालों से पूछ कर ये रिश्ता बनाया था? निभा नहीं सकते थे तो प्यार क्यों किया?'
'आपने भी तो किया था। क्यों छोड़ दिया उसे? वो भी ऐसे ही तड़पा होगा जैसे आज आप तड़प रही हैं!'
' मैंने तुम्हें साफ साफ सब कुछ बताया था। फिर भी आज तुम मुझे दोषी ठहरा रहे हो। सारी मर्द ज़ात के रहनुमा हो तुम जो उसके साथ हुए अन्याय का बदला लेने आए हो? क्या फ़र्क़ है तुम दोनों में? दोनों ही मजबूरी का झंडा उठाए मेरे प्यार की बलि देने को तैयार हैं। यदि वो पुरूष होता तो मुझे बैसाखी न समझ कर मेरी ढाल बनता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ तो मेरी क्या गलती? रिश्ता निभाना क्या सिर्फ मेरी ज़िम्मेदारी थी, उसकी नहीं?'
'रहम कीजिए आप मुझ पर। बाप नहीं है मेरा!!'
' शिरीष तुम घर पर कब बात करोगे?'
'वनिता असल में आपकी उम्र...!!'
'मेरी उम्र क्या? आपको रिश्ता बनाने से पहले नहीं पता था मेरी उम्र का?'
'पता था पर मुझे एहसास नहीं था कि मेरे घरवाले इस कदर अड़ जाएंगे।'
'मनाओ उन्हें शिरीष। मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूं। तुम्हें कभी खोना नहीं चाहती। एक बार शादी हो गई फिर सब ठीक हो जाएगा।'
' कुछ ठीक नहीं होगा। मैंने आपसे शादी की तो मेरे घरवाले हमेशा के लिए मुझसे रिश्ता तोड़ लेंगे।'
' तुम कहना क्या चाहते हो? क्या अपने घरवालों से पूछ कर ये रिश्ता बनाया था? निभा नहीं सकते थे तो प्यार क्यों किया?'
'आपने भी तो किया था। क्यों छोड़ दिया उसे? वो भी ऐसे ही तड़पा होगा जैसे आज आप तड़प रही हैं!'
' मैंने तुम्हें साफ साफ सब कुछ बताया था। फिर भी आज तुम मुझे दोषी ठहरा रहे हो। सारी मर्द ज़ात के रहनुमा हो तुम जो उसके साथ हुए अन्याय का बदला लेने आए हो? क्या फ़र्क़ है तुम दोनों में? दोनों ही मजबूरी का झंडा उठाए मेरे प्यार की बलि देने को तैयार हैं। यदि वो पुरूष होता तो मुझे बैसाखी न समझ कर मेरी ढाल बनता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ तो मेरी क्या गलती? रिश्ता निभाना क्या सिर्फ मेरी ज़िम्मेदारी थी, उसकी नहीं?'
'रहम कीजिए आप मुझ पर। बाप नहीं है मेरा!!'
हमेशा की तरह शान्त और संयमित लहज़े में बात करने के बजाय शिरीष नियंत्रण खोकर चीखा। आवेश में उसके मुंह से निकले कड़वे सच को सुनकर वनिता एकबारगी तो सकते में आ गई। अगले ही पल अपने भविष्य की चर्चा ठंडे बस्ते में डालकर उसने कहा ' शिरीष आप अभी कुछ सोचने समझने की हालत में नहीं हो। आप अभी घर जाओ। हम फिर कभी बात करेंगे।'
उस रात वनिता सो नहीं सकी। बार बार शिरीष की बातें उसका लहज़ा उसके कानों में चुभते रहे। एक तरफ उसकी मजबूरी थी तो दूसरी तरह वनिता की बेइंतेहा चाहत। वनिता कभी भी शिरीष की जिम्मेदारियों के बीच नहीं आना चाहती थी। बल्कि वो तो उसके साथ मिल कर उसकी ज़िम्मेदारियों में हाथ बटाना चाहती थी। उसने हमेशा खुद से पहले दूसरों की ज़रूरतों को तवज्जोह दी थी। पर आज शिरीष का ये व्यवहार उसे बेहद नागवार गुजरा था। वनिता बेहद सशक्त और स्वाभिमानी इंसान थी। वो किसी पर भी आर्थिक या भावनात्मक रूप से निर्भर नहीं थी। इसी बात का फायदा उठा कर शिरीष बार बार उसे ये एहसास दिला देता था कि उसका होना न होना बराबर था। वो कोई अबला नारी तो नहीं थी जो किसी की याद में रो रोकर जीवन काटती। वो तो आज के ज़माने की आत्मनिर्भर नारी थी जिसने अपनी ज़िंदगी में एक मकाम हासिल किया था। उसकी अपनी एक पहचान थी जो किसी आदमी के नाम की मोहताज नहीं थी।
पर इसका ये मतलब तो नहीं था कि विवाह या जीवनसाथी की उसकी निगाह में कोई अहमियत ही नहीं थी। एक इंसान से इस कदर जुड़ कर अब अलग होना उसे अंदर से खाए जा रहा था। पर किसी ने भी कभी उसके मन में झांक कर देखा ही नहीं। सबका साथ देने वाली वो लड़की अंदर से इतनी तन्हा हो सकती है कोई सोच भी नहीं सकता था। पुरुष बिना सोचे समझे चाहे जैसे संबंध बना लेता है। समाज उसे न सिर्फ स्वीकार करता है बल्कि उसकी गलतियां माफ करके उसे दूसरा मौका भी आसानी से दे देता है। वहीं एक स्त्री के लिए विवाह के अलावा कोई विकल्प ही नहीं।
वो कितनी भी सम्पन्न और सुसंस्कृत हो पर विवाहित न हो तो उसकी सारी उपलब्धियों को समाज नकार देता है।
वो कितनी भी सम्पन्न और सुसंस्कृत हो पर विवाहित न हो तो उसकी सारी उपलब्धियों को समाज नकार देता है।
वनिता ने मन ही मन ये निश्चय किया कि वो शिरीष पर किसी तरह का बेजा दबाव नहीं डालेगी। अगर उसे वनिता का साथ देना होगा तो वह खुद आगे बढ़ कर उसका साथ देगा। वरना वो यही सोच कर अपने जीवन में आगे बढ़ जाएगी कि शिरीष की किस्मत में उसका साथ लिखा ही नहीं था। हर चीज़ अपनी मेहनत और लगन से हासिल करने वाली वनिता आज खुद को बुरी तरह हारा हुआ महसूस कर रही थी। फिर भी ईश्वर पर अटूट विश्वास के साथ उसने अपने रिश्ते और भविष्य को समय पर छोड़ दिया।
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