आधुनिका अध्याय 5 रवायतें


इस कहानी के कुछ हिस्से और भाषा 18 वर्ष से कम उम्र के पाठकों के लिए उचित नहीं हैं। Reader discretion advised.                     
                              
उस दिन कॉफी शॉप में वनिता का अतीत जानने के बाद शिरीष एक अजीब सी कशमकश में फंस गया था। एक तरफ तो वनिता की खूबसूरती और नेक सीरत उसे आकर्षित कर रहे थे वहीं दूसरी तरफ उसका अतीत उसे रोकने लगा था। वो जब भी बात करते शिरीष की आंखों के सामने वो अंजान चेहरा एक साये की तरह आ जाता । अनिर्णय की स्थिति में भी वनिता से बात करना और उसके साथ समय बिताना शिरीष ने छोड़ा नहीं था। उसकी नेक सीरत, उसका आत्मविश्वास और उसके गुण धीरे धीरे उसके दिल में जगह बना रहे थे। इसके साथ ही वनिता हमेशा शिरीष को कुछ अलग करने को प्रेरित करती रहती थी। समय पर सब कुछ छोड़ कर शिरीष ने इस सैलाब में बहते जाने का निर्णय किया।
'है बड़ी जानदार चीज़! मज़ा आ गया कल।' पीछे से आते शिरीष को कनखियों से देखते साहनी साहब ने शर्मा जी से कहा। 'पर सर सबके सामने तो उसने आपको धूल चटा दी थी उस दिन।' अरे यार शर्मा!! हाथी के दांत खाने के और...' एक कुटिल मुस्कान के साथ साहनी साहब ने शिरीष की तरफ मानीखेज़ नज़रों से देखा। शिरीष सर झुका कर आगे तो बढ़ गया लेकिन उसका उलझा हुआ दिमाग अब और बुरी तरह से उलझ गया था।
उस दिन शाम को प्रकृति भी शायद साहनी की हरकत से सख्त नाराज़ हो गई थी। दोपहर से चल रही तेज़ बारिश अब तूफान में बदलने लगी थी। शिरीष बस स्टॉप पर खड़ा इंतज़ार कर ही रहा था कि वनिता एक बार फिर उसे नज़र आई। एक गहरी नज़र उस पर डाल कर आज सब कुछ साफ साफ पूछने के इरादे से शिरीष गाड़ी में बैठ गया। 'मैम क्या हम कहीं बाहर चल सकते हैं? कुछ बात करनी है आपसे।' 'मौसम इतना खराब है शिरीष हमें घर की तरफ ही चलना चाहिए। After all, home is the safest place' 'Ok' 
शिरीष के हामी भरते ही वनिता ने गाड़ी का रुख अपने घर की तरफ मोड़ दिया। उसे भी शिरीष से एकांत में कुछ बात करनी थी। घर आकर कॉफ़ी के दो मग हाथ में लिए वनिता ने बात शुरू की 'क्या बात करनी थी आपको?' 'मैम क्या साहनी साहब कल आपके घर आये थे?' वनिता को अब सारी बात साफ समझ आ चुकी थी फिर भी उसने शिरीष की आंखों में आँखें डाल कर कहा 'हां वो आए तो थे।' ' मैं समझता था आप एक सुलझी हुई समझदार लड़की हैं पर आप तो!!'
'क्या मतलब है तुम्हारा शिरीष? साहनी साहब मेरे लिए ऑफिस में काम करने वाले एक कलीग मात्र हैं। अगर किसी काम के लिए वो घर आ भी गए तो क्या हुआ? मैंने उस दिन उन्हें चेतावनी दे दी थी और वो समझ भी गए थे। अब उस बात को बढ़ाने से क्या फायदा?' ' मैम आपको कोई अंदाज़ा नहीं है लोग आपके बारे में क्या क्या बोल रहे हैं!' 'मुझे परवाह भी नहीं है पर जो मेरे अपने हैं कम से कम उन्हें तो मुझ पर विश्वास होना चाहिए। साहनी साहब अपने उस दिन के व्यवहार की माफी मांगने और मुझे अपने बच्चे के जन्मदिन पर न्यौता देने के लिए आये थे। अगर वो फिर कोई गलत हरकत करते तो मैं ज़रूर उनको उसी तरह जवाब देती। पर शायद उन्हें उनकी गलती का एहसास हो गया है इसलिए ऐसी कोई हरकत उन्होंने नहीं की। अगर तुम मेरा विश्वास कर सको तो ठीक है वरना मैं अपना सच जानती हूं। यही सोच लूंगी कि तुम भी उसी समाज का हिस्सा हो तो उनसे अलग नहीं सोच सकते।'
बहुत देर से वनिता की आंखों में मचलते आंसू अचानक बांध तोड़ कर बहने लगे। शिरीष की समझ में नहीं आया कि वो क्या कहे और क्या करे। उसे एहसास हो रहा था कि कहीं न कहीं उसने वनिता को अपनी बातों से चोट पहुंचाई है। उसे इस बात का अंदाज़ा ही नहीं था कि वनिता जैसी सशक्त उर आत्मविश्वासी लड़की अंदर से इतनी नाज़ुक भी हो सकती थी। मुंह फेर कर चुपचाप आंखें मसलती वनिता उसे बेहद प्यारी लगी और उसी वक़्त उसने फैसला कर लिया कि वनिता को अपनी हमकदम ज़रूर बनाएगा। मज़बूत इरादे से आगे बढ़ कर उसने वनिता को अपनी बाहों में लिया और बोला 'I love you, mam। Will you marry me?' 'क्या!!' अचानक वनिता के आंखों में आंसुओं की जगह ढेरों आश्चर्य छलक आया। ' अगर आप न कर भी देंगी तो मैं समझ जाऊंगा। पर कुछ बोलिए, प्लीज।' 'सच कहूं तो शिरीष आप मुझे शुरू से ही पसंद हो। पर मेरा एक अतीत है जो मैंने आपको पहले ही बता दिया। लोग भी समय समय पर मेरे बारे में अपने नेक ख्याल जताते रहते हैं। इसके अलावा हमारे बीच उम्र का अंतर भी है। आप एक बार अपने घर पर बात कर लो।' 'मैम आप एक बात भूल गईं।' 'क्या?' 'ये कि मेरी और आपकी हैसियत में बहुत फर्क है।' 'कोई फर्क नहीं है शिरीष। आप भी उतनी ही मेहनत करते हैं जितनी मैं। आपने अपने परिवार की भलाई के लिए बलिदान किया और ये छोटी सी नौकरी स्वीकार कर ली वरना आप शायद मुझसे भी अच्छी नौकरी कर रहे होते। वैसे भी कल किसने देखा है। क्या पता कल आपकी मेहनत और आपकी किस्मत आपको मुझसे भी ऊंचा मकाम दे दे।' 'और अगर मैं ये कहूँ कि मैं इसी में खुश हूं तो?' 'तो फिर शिरीष गीता में लिखा है क्या तेरा क्या मेरा! मेरी सफलता और मेरी हर चीज़ मैं आपके साथ बांटने को तैयार हूं। अगर एक पुरुष अपने परिवार के लिए कमाई कर सकता है तो एक स्त्री क्यों अपने जीवनसाथी का हाथ नहीं बंटा सकती? I love you too, शिरीष।'
उस रात वनिता को बाहों में समेटे शिरीष एक सैलाब में बहने से खुद को रोक न सका। वो दोनों सब कुछ भूल कर एक दूसरे में ऐसे खोए कि हर वर्जना भूल कर वो एक दूसरे में समा गए और उनके दोस्ती के रिश्ते पर मुहब्बत की मुहर लग गई। आने वाले कल से अनजान उनींदी आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने सजाए दोनों मीठी नींद सो गए।


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