आधुनिका अध्याय 12 दिशाहीन


मेरे प्रिय साथियों
क्या लिखूँ?  इस कहानी के दो अंत हो सकते हैं. एक वो जो हक़ीक़त में हुआ था और एक रोमांटिक सा कहानीकार की सुखद कल्पना में डूबा। मेरी दोस्त ने कहा था सच्चाई लिखो। पर मैं चाहती हूं वनिता और उसके जैसी हज़ारों लाखों लड़कियों के मन में एक उम्मीद जगाना। इसलिए मैं दोनों लिखती हूँ.. आपको जो पसंद आए स्वीकार कर लीजिए। पर मुझे ज़रूर बताइएगा आपको कौन सा ज्यादा पसंद आया।
                           
आज शिरीष फिर बस स्टॉप पर खड़ा था। आज भी वही बारिश थी और वही वनिता की कार। बस अंतर इतना था कि आज वनिता ने हंस कर उसे hello नहीं कहा। न ही उसके लिए गाड़ी रोकी और न उसे घर छोड़ने को कहा। अनायास ही वनिता से हुई अंतिम मुलाकात उसकी आंखों के आगे आ गई...
वनिता हाथ में शिरीष की शादी का card लिए हाथ जोड़े उसकी मां के आगे विनती सी कर रही थी। माँ प्लीज ऐसा मत कीजिए। मैं आपके बेटे को बेहद प्यार करती हूं।' 'जो कुछ भी हुआ उसमें गलती तुम्हारी ही है। इतने साल उसके साथ घूमने फिरने से पहले एक बार पूछ तो लेती कि तुम जैसी लड़की के साथ मैं अपने बेटे की शादी करूँगी भी या नहीं! ' मां बात वो नहीं है। रिश्ता टूटा था इनका। मैं तो बस इनसे सहानुभूति जता रहा था।' शिरीष ने एक दूसरी ही तस्वीर उसकी माँ के आगे रख दी। 'असलियत ये है न मां कि इनको घर का नौकर चाहिए, जो इनके सारे काम करता रहे। पैसे से खरीदना चाहती है मुझे।' वनिता के अंदर और कुछ भी सुनने की हिम्मत शेष नहीं थी। उसने भरे गले से कहा ' बस करो शिरीष। भगवान जानता है सच क्या है और हमारे बीच में क्या था। पर इतना जरूर कहूंगी तुमने जो भी आज किया है वो एक दिन तुम्हारे आगे आएगा। उस दिन देखेंगे।'
उसके बाद वनिता ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। आज भी शिरीष उसे नजर आ जाता था पर वो उसे ऐसे नज़रन्दाज़ करती जैसे वो था ही नहीं। वनिता को ठोकर ज़रूर लगी थी पर वो अपने आप को संभाल कर एक बार फिर दुनिया का सामना अपनी उसी मुस्कान के साथ करने लगी थी। एक बार फिर जीने लगी थी। खुश रहने लगी थी। प्यार, दोस्ती और शादी नाम के लफ्जों को अपनी ज़िंदगी की किताब से हमेशा के लिए निकाल कर वो अपनी ऊंची नौकरी और किताबों में खो गई। कभी कभी याद करती थी अपने अतीत को पर एक बुरे सपने की तरह। बारिश के मौसम में हाथ में coffee लिए अक्सर सोचती 'ज़िन्दगी कुछ और भी हो सकती थी। पर जो है वो ही सही है शायद।'
12 बरस बाद:
नई कलेक्टर साहिबा के प्रोटोकॉल में लगा हुआ शिरीष सुबह से भाग दौड़ कर हलकान हुआ जा रहा था। उसकी कंपनी में आज उनका पहला दौरा था। कंपनी के बड़े से बड़े अधिकारी वहां मौजूद थे। अचानक उनका काफिला वहां आकर रुका और वनिता उसमें से बाहर निकली। वनिता को देख कर शिरीष चौंक गया। वो सोच भी नहीं सकता था कि उसके इन्कार से बुरी तरह टूटी हुई वनिता का वो ये रूप देखेगा। वनिता एक बार फिर उसे नजर अंदाज़ करके आगे बढ़ गई पर इस बार उसके पीछे पीछे लोगों का एक बड़ा हुजूम भी उसी के साथ चल पड़ा।


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