आधुनिका अध्याय 9 : प्यार के लिए
कॉफी का कप हाथ में लिए वनिता अतीत में खो गई। आज जो शिरीष उसे घमंडी और दिखावेबाज़ कह रहा था, उसी शिरीष ने कभी उसकी उपलब्धियों से प्रभावित होकर उसका हाथ थामने की गुजारिश की थी। वनिता सोच रही थी कि स्त्री और पुरुष के लिए कितने अलग नियम कायदे हैं। उसने कभी अपने स्त्री होने पर न तो अफसोस किया था न ही कभी इस बात को अपने राह की बेड़ी बनने दी थी। पर आज शिरीष के बदलते व्यवहार के कारण वो सोचने पर मजबूर हो गई थी। जब कोई पुरूष किसी उच्च पद को सुशोभित करता है तो कितनी आसानी से उसके विवाह के लिए रास्ते खुले होते हैं। वो अपने समकक्ष या कमतर किसी से भी आसानी से विवाह कर सकता है। बल्कि अपने से आर्थिक या सामाजिक स्तर में थोड़े निचले पावदान में रिश्ता जोड़ने पर उसकी मान प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। लेकिन वहीं स्त्री अगर अपने कैरियर में एक सम्मानजनक स्थिति में हो तो अपने से ऊंचा ही उसको देखना पड़ता है। बल्कि उसके रास्ते में ये कह कर और कांटे बिछाए जाते हैं कि कैरियर को समर्पित स्त्री में वो घरेलूपन और वो विनम्रता होती ही नहीं जो एक घर बनाने के लिए ज़रूरी है।
वनिता ने नज़र भर कर अपने घर की ओर देखा और मन ही मन शिरीष की बातों के बारे में सोचने लगी। 'आपसे ये बड़ा घर छोड़ा नहीं जाएगा।' जिस घर में बचपन से पली बढ़ी होती हैं, जहां उसके सारे रिश्ते नाते और यादें होती हैं जब वो घर छोड़ कर हम एक नए घर में बिना शर्त प्रवेश करते हैं तो ये मकान जो कि कंपनी का दिया हुआ है जिस पर हमारी कोई दावेदारी भी नहीं, उसका कैसा मोह? क्या सच में वो एक घर नहीं बना सकती, एक घर का हिस्सा नहीं बन सकती? किसी के संस्कारों और रीत रिवाज़ों को नहीं निभा पाएगी? ऐसी बहुत सी आशंकाओं ने सर उठाया पर फिर वनिता को याद आया कि कैसे वो परायों को भी अपना बना लिया करती थी। फिर ये तो उसका अपना ही परिवार होने वाला था।
लेकिन वो परिवार तो उसकी लाख कोशिशों के बाद भी उसे अपनाने में हिचक रहा था। वो समझ ही नहीं पा रही थी कि कैसे यकीन दिलाए उन सब को कि उसके बारे में चलने वाली चर्चाओं में ज़रा भी सच्चाई नहीं थी। अपने स्वार्थ और दुराग्रह के कारण कुछ लोग उसका जीवन नष्ट करने में लगे थे और कुछ हद तक सफल भी हो रहे थे। दफ्तर में उसकी साफगोई और ईमानदारी से प्रभावित होने वाले भी पर निंदा रस का लोभ नहीं छोड़ पाते थे।
पुरुष जब प्यार करता है तो स्वच्छन्द होना उसकी पहली अलिखित शर्त होता है। स्त्री जब प्रेम करती है तो उस प्रेम के लिए जितना त्याग वो कर सकती है वही उसके प्रेम का पैमाना होता है। प्यार स्त्री को आज़ाद नहीं करता, बांध देता है। फिर भी हर स्त्री प्यार करती है और टूट के प्यार करती है।
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