अध्याय 11 मैं हूँ न
वनिता की ज़िंदगी में शिरीष की जगह और अहमियत दोनों बढ़ते जा रहे थे। ऑफिस में भी सभी शिरीष के प्रति वनिता के आदर और लगाव को महसूस कर सकते थे। वो जहां भी जाती दबी जुबान में लोग उसके और शिरीष के बारे में चर्चा किया करते थे। पर वनिता से सीधे कुछ भी कहने की हिम्मत शायद किसी की नहीं थी।परंतु शिरीष गाहे बगाहे लोगों के तानों का शिकार होता जा रहा था।
अजीब बात है कि हम कहने को तो अपनी निजी जिंदगी में किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करते। पर वही हम शादी और जीवनसाथी जैसे महत्वपूर्ण निर्णय में परिवार, समाज और प्रचलित मान्यताओं पर इंसान के नैसर्गिक गुणों से ज़्यादा भरोसा करते हैं। साहसी से साहसी लोग भी जाति, धर्म , उम्र और कुंडली के फेर से बच नहीं पाते।
ऐसा ही शिरीष का हाल था। हर पल वनिता के साथ रहने और उसके द्वारा प्रेम, स्नेह और आदर देने के बावजूद वह वनिता से शादी करने के अपने निर्णय पर पछता रहा था। उसे इस बात की भी परवाह नहीं रही कि वनिता की छवि पर इसका क्या प्रभाव होगा। वह अपने परिवार और समाज के दोहरे दबाव का सामना करने में खुद को अक्षम पा रहा था। पर वनिता जैसी साहसी लड़की से अपनी इस कमज़ोरी की चर्चा करके वह उसकी नज़र से उतारना भी नहीं चाहता था।
इन सब से बेखबर वनिता उसे अपने हर निर्णय का साझीदार बनाती थी और उसे हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रहती थी। उसे शिरीष की क्षमताओं और प्रतिभा पर पूरा विश्वास था।
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