आधुनिका अध्याय 3 : घमंडी लड़की
'ये क्या है शर्मा जी! मैंने कई बार आपसे कहा है कि अर्जेंट फाइलें उसी दिन क्लियर कर दिया कीजिये। बड़े साहब चार दिन से इस फ़ाइल के बारे में पूछ रहे हैं।' मेज़ पर एक फ़ाइल पटकते हुए वनिता ने अपने PA से ऊंचे स्वर में पूछा। कल ही तो शर्मा जी कैंटीन में सबको कह रहे थे 'वनिता मैम तो वही करती हैं जैसा मैं बताता हूँ। खुद से तो कुछ कर ही नहीं पातीं।' आज पूरा ऑफिस खामोशी से उनके खोखले दावों की धज्जियां उड़ते हुए देख रहा था। शर्मा जी उस वक़्त तो कुछ बोल न सके पर उस दिन के बाद से वनिता के लिए उनकी आंखों में और ज़ुबान में बेइंतेहा नफरत भर गई।
'मे आई?' शिरीष ने हौले से पूछा तो किताब से नज़रें उठा कर वनिता ने धीरे से उसे बैठने का ईशारा किया। 'मैम आपको नहीं लगता उनकी गलती इतनी बड़ी नहीं थी।' शिरीष ने अपनी राय रखी। वनिता ने धीरे से कहा ' शिरीष जी ये कोई पहली बार नहीं है कि किसी से इज़्ज़त और विनम्रता से पेश आने और विश्वास करने का नतीजा हमें भुगतना पड़ रहा है। दूसरी बात ये है कि हमारे लिए कोई काम कितना भी छोटा हो उससे किसी न किसी की ज़रूरत जुड़ी हुई है। इस बात को और कंपनी की छवि को हमें हमेशा ध्यान में रखना चाहिए। वनिता के इतना कहने पर शिरीष को अचानक वो समय याद आ गया जब पापा के जाने के बाद छोटी से छोटी बात के लिए लोगों ने उसे एक से दूसरी टेबल तक कई कई दिन दौड़ाया था। उस वक़्त के कड़वे अनुभव ने उसे औरों की मदद करने को प्रेरित किया था।
अगले दिन से ऑफिस का पूरा माहौल ही बदला हुआ था। वनिता के आते ही एक दूसरे के सिर से सिर जोड़े खुसुर पुसुर करते हुए लोग अपनी अपनी जगह बैठ कर काम में व्यस्त होने का दिखावा करने लगे। वनिता का ध्यान तभी उसकी मेज़ पर रखे एक बड़े से गुलदस्ते पर गया। उसे अच्छी तरह पता था कि भेजने वाला कौन हो सकता है फिर भी तस्दीक के लिए उसने गुलदस्ते में लगे कार्ड को खोला। एक बार फिर वो गुलदस्ता साहनी साहब ने ही भेजा था। साहनी साहब वनिता की तरह कंपनी में कार्यरत उच्चाधिकारी थे। विवाहित तथा दो प्यारे से बच्चों के पिता होने के बावजूद वो जब तब वनिता को कोई उपहार भेज कर अपनी तरफ आकर्षित करने के मौके तलाशते रहते थे। वनिता ने कई बार उन्हें उनके पद की गरिमा और उनके सुखी पारिवारिक जीवन का हवाला दिया पर वो फिर भी हठधर्मिता की नई नई मिसालें पेश करते ही रहते थे।
'रामसिंह' घंटी बज कर उसने अपने चपरासी को बुलाया और गुलदस्ता वापस साहनी साहब के कमरे में रख कर आने को कहा। आज एक बार फिर किसी ने अपनी सीमा का अतिक्रमण किया था। वनिता का अक्सर ऐसे पुरुषों से सामना होता ही रहता था जो उसके अकेले होने को उसके available होने की हरी झंडी समझ लेते थे। वो ऐसे लोगों से निपटना खूब जानती थी पर दो मासूम बच्चों का ख्याल बार बार उसे कोई कड़ा कदम उठाने से रोक रहा था। पर अपनी सुरक्षा और गरिमा के खिलाफ साहनी के बढ़ते दुस्साहस को वो नज़रअंदाज़ भी नहीं कर पा रही थी।
इसी कशमकश में उसके पांव एक कप चाय की राहत तलाशते कैंटीन की तरफ बढ़े की अचानक अपना नाम सुन कर वो थम गई। 'समझती क्या है तू अपने आप को! साली रिजेक्टेड पीस। तुझे तो मेरा शुक्रिया अदा करना चाहिए कि तेरी इस पकी हुई उम्र में भी तुझ पर मेहरबान हो रहा हूँ।' तड़ाक! वनिता के सब्र की सीमा अब टूट चुकी थी। उसने अपने आंखों में मचलते आँसुओं को रोक कर साहनी के गाल पर एक जोरदार तमाचा रसीद किया और कहा 'तेरे दो मासूम बच्चों का ख्याल करके मैं इतने दिन तक चुप रही वो मेरी बहुत बड़ी भूल थी। तेरे जैसे पिता के साथ रहने से अच्छा है कि वो पिता के साये से भी दूर रहें। कान खोल कर सुन, अब तक जो हुआ सो हुआ पर अब अगर तूने एक भी गंदी हरकत की तो मैं तेरी शिकायत न सिर्फ कंपनी की internal commitee बल्कि नेशनल कमीशन ऑफ वीमेन में भी करूँगी। इतना कह कर वनिता दृढ़ता के साथ कैंटीन की तरफ बढ़ गई इस बात से अनजान कि शिरीष एकटक उसी को प्यार और गर्व भरी नज़रों से देखे जा रहा था। शायद आज ही उसे एहसास हुआ था कि वो वनिता से प्यार करने लगा था।
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