आधुनिका अध्याय 4 धोखा था
शिरीष और वनिता की कॉफ़ी शॉप की मुलाकातें अब अक्सर होने लगीं। बहुत वक़्त बाद एक अच्छा दोस्त मिला था वनिता को जिसके साथ वो खुल कर बात कर पा रही थी। वहीं शिरीष को उसके ज्ञान और अनुभव से काफी कुछ सीखने को मिलता था। तीन साल का उम्र का अंतर और ऑफिस में उनके बीच का फासला भी उनकी दोस्ती के आड़े नहीं आ सका था। जैसे जैसे वनिता उससे खुलती जा रही थी शिरीष की झिझक धीरे धीरे खत्म होने लगी। एक दिन उसने हिम्मत करके वनिता से वो सवाल पूछ ही लिया जो न जाने कब से उसे परेशान कर रहा था 'मैम आपने अब तक शादी क्यों नहीं की?' वनिता की लंबी चुप्पी से घबरा कर शिरीष ने उससे कहा 'सॉरी मैम, मैं शायद कुछ ज़्यादा बोल गया।' ' नहीं शिरीष, बात वो नहीं है। बस इतना वक़्त हो गया इस बात को इसलिए सोच रही थी कहां से शुरू करूं। मैंने शुरू से ही यह सोच रखा था कि मैं सबसे पहले अपने कैरियर को प्राथमिकता दूंगी। जब तक मैं अपने लक्ष्य को नहीं पा लेती तब तक ऐसा कुछ नहीं सोचूंगी। कहने को आज की दुनिया में लोग प्रगतिशील हो गए हैं और लड़कियों को भी अपने सपने पूरे करने का अधिकार है पर शादी के बाद मैंने बहुत सी प्रतिभावान और महत्वाकांक्षी लड़कियों को घर गृहस्थी में अपने सपने भूलते देखा है। इसलिए मैंने सोचा तो यही था कि मैं अपने सपने पूरे करूँगी।' 'और आपके मां बाप? उन्होंने कभी आपकी बढ़ती उम्र और इस एकांत के बारे में नहीं सोचा?' ' मेरे मां बाप को मेरी फिक्र तो है पर उन्हें मुझ पर पूरा विश्वास है।' 'और प्यार?आपको कभी किसी से प्यार नहीं हुआ?' 'हुआ था पर शादी तक बात पहुंच नहीं सकी' वनिता की बात सुन कर शिरीष को गहरा धक्का लगा। कहाँ वो घर की ज़िम्मेदरियों और मजबूरियों के बोझ तले दबी हुई इच्छाओं और अरमानों की कहानी सुनने की अपेक्षा कर रहा था कहां वनिता का सुखी और संतुष्ट जीवन ! आज वनिता उसे थोड़ा स्वार्थी नज़र आई। न जाने कौन रहा होगा वो बेचारा जिसका दिल वनिता ने तोड़ा था। शिरीष से रहा नहीं गया तो उसने वनिता से फिर पूछा 'और मैम, वो लड़का..' 'शिरीष प्यार बहुत आसान होता है पर उसे निभाना बेहद मुश्किल है। मैंने अपने जीवनसाथी में हमेशा साहस और महत्वाकांक्षा के साथ साथ मुझ पर अटूट विश्वास भी देखना चाहा है। ऐसे में जब मैंने अपने होने वाले जीवनसाथी में महत्वाकांक्षा का अभाव देखा तो मुझे उसके साथ घुट घुट कर एक लंबी ज़िन्दगी जीने से अच्छा एक बार साहस करके उससे अलग संसार बसाना ही ठीक लगा। शायद एक साथ रह कर हम और भी अजनबी हो जाते।' शिरीष कहे बिना रह न सका ' मैम आपको नहीं लगता आपने चंद पैसों और सुख सुविधाओं के लिए किसी का दिल तोड़ दिया? सच्चा प्यार बार बार नहीं मिलता।' 'जीवन भी बार बार नहीं मिलता शिरीष। जीवन की सार्थकता भी हाथ पर हाथ रखकर किस्मत को कोसने में नहीं बल्कि कर्म और कोशिश से मस्तक पर लिखे को मिटाने का प्रयास करने में है। मैंने जब ये नौकरी की तभी उस लिखे हुए को मिटाने की ओर एक कदम मैंने बढ़ा दिया था। वही एक कदम अगर वो भी बढ़ा लेता तो शायद हम एक साथ होते। मैं उसकी आर्थिक स्थिति से समझौता करने को तैयार थी पर अपनी कायरता को मजबूरी का नाम देने के उसके रवैये ने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं अपना अलग मार्ग ही चल लूं। समाज ने कभी मुझे लड़की होकर भी अपने निर्णय खुद लेने के लिए माफ नहीं किया। मैंने भी कभी समाज के दोगलेपन के आगे सिर नहीं झुकाया। बस इतनी सी बात है।' उस रात शिरीष पूरी रात वनिता के बारे में सोचता रहा। कहीं न कहीं उसकी बातों में सच्चाई भी थी पर समाज में रहकर उससे विपरीत दिशा में चलना शिरीष का संस्कारी और कुछ हद तक रूढ़िवादी मन स्वीकार नहीं कर पा रहा था। जिस वनिता के आत्मविश्वास, उपलब्धियों और गुणों ने उसे आकर्षित किया था उसी के जीवन के इस पहलू से वाकिफ होकर शिरीष खामोश सा हो गया था। चांद में दाग की तरह वनिता का अतीत बार बार शिरीष की आंखों के आगे आ रहा था।साथ ही साथ अपने घर के सीमित संसाधन और उनको दूर करने के लिए ढेर सारे पैसों की ज़रूरत कहीं न कहीं वनिता के निर्णय को सही भी ठहरा रही थी।
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