आधुनिका अध्याय 12 तुम्हारे लिए
शिरीष का फोन काटने के बाद वनिता को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे। वो चाहती तो उसे धूल में मिला सकती थी। उसकी नौकरी और प्रतिष्ठा को चोट पहुंचा सकती थी। एक शिकायत करके उसके इस खोखले दावे की हवा निकाल सकती थी कि वनिता उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। पर वो शिरीष को बेहद प्यार करती थी इसलिए उसने एक आखिरी कोशिश करने का निश्चय किया। वो शिरीष के घर पहुंच गई। ' प्रणाम मां।' वनिता को अपने घर आया देख कर शिरीष चौंक गया। ' प्लीज बैठिए। आपसे कुछ बात करनी है।' 'मां मेरा नाम वनिता है। मैं शिरीष के साथ काम करती हूं। ' ' हाँ, बताया था उसने तुम्हारे बारे में।' ' मां मैं जो कहने जा रही हूं शायद आपको मेरी बेअदबी लगे लेकिन मेरे पास अब और कोई रास्ता नहीं है। मैं और शिरीष एक दूसरे को पसंद करते हैं. शादी भी करना चाहते हैं।पर शिरीष के लिए आपकी इच्छा ही सब कुछ है माँ। मैं जानती हूं आपने मेरे बारे में अच्छी बातें नहीं सुनी। पर सच ये है कि वो सब लोगों की ईर्ष्या में लगाई हुई आग है। मैं असलियत में वैसी नहीं हूं माँ। एक बार मुझे जान लीजिए। फिर जो भी आपका निर्णय हो मैं सर झुका के मान लूंगी।' मां ने शिरीष की तरफ देखा जो सिर झुकाए बैठा था। ' क्या ये सब सच है शिरीष?' ' हां माँ। मैं और वनिता एक दूसरे को दो साल से जानते हैं। ये बहुत अच्छी लड़की है मां। आपको बहुत खुश रखेगी। पर आपकी इच्छा ही मेरे लिए सब कुछ है। आप जो कहेंगी हम मान लेंगे। ' ' बहुत बड़े हो गए हो तुम शिरीष। सारे के सारे निर्णय अकेले ही लेने लगे। एक बार मुझसे कहते तो सही। मैं भी तो परखती तुम्हारी पसंद को। 'मां वो.. मैं..' शिरीष सकपकाया। ' क्या माँ..! जा जल्दी से आरती की थाली लेके आ। बहु पहली बार घर आई है। स्वागत तो करूँ..!' वनिता की आंखें खुशी के मारे छलक पड़ीं और दोनों मां के पैरों में आशीर्वाद के लिए झुक गए।
12 साल बाद:
नए नियुक्त हुए कलेक्टर साहब के आने का संकेत हो चुका था। वनिता जो अब अपनी कंपनी की जनरल मनेजर बन चुकी थी, स्वागत के लिए सारी व्यवस्था की देख रेख में लगी थी। सारे उच्चाधिकारी गेट पर स्वागत के लिए तत्पर खड़े थे। तभी गाड़ियों का काफिला रुका और शिरीष उस गाड़ी में से बाहर निकला। वनिता ने तिलक लगा कर उसका स्वागत किया। लोग उन दोनों की खूबसूरत जोड़ी की तरफ कुछ मुग्ध और कुछ ईर्ष्या से देख रहे थे। जो प्रेम कहानी एक मंच से शुरू हुई थी वो आज एक दूसरे मंच पर अपने अंजाम तक पहुंची। आज माइक शिरीष के हाथ में था और सब बेसब्री से उसके बोलने का इंतज़ार कर रहे थे। ' मेरी कहानी इसी कम्पनी से शुरू हुई थी। जब मैं यहां आया तो सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं एक दिन इस मुकाम पर पहुंचूंगा। सच यही है कि हर सफल आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है। मैं बेहद खुशनसीब हूँ कि मेरी सफलता के लिए एक नहीं बल्कि दो दो नारियों का योगदान है। एक मेरी माँ जिन्होंने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया और एक वनिता जो न सिर्फ मेरी बल्कि न जाने कितनों की प्रेरणास्रोत हैं। और खुशकिस्मती से मेरी हमसफर भी। आज मैं जो भी हूँ इन दोनों के कारण हूँ। आप सब से बस इतना और कहूंगा ' कामकाजी लड़कियां कोई हमसे और हमारे समाज से अलग नहीं होतीं। हम न जाने क्यों उनको समाज की मुख्यधारा से काटने में लगे रहते हैं। जब एक पुरूष महत्वाकांक्षी हो सकता है तो स्त्री क्यों नहीं? और हां घर से बाहर अपनी आजीविका कमाने वाली स्त्री का सम्मान करना सीखिए। वो भी आपकी तरह किसी की बीवी है, बहन है, पत्नी है। यदि वो ये सब न भी हो तब भी सम्माननीय है। एक मनुष्य के रूप में उसको देखिए। वस्तु के रूप में नहीं।' पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा था और शर्मा और साहनी किसी कोने में मुंह छुपाए exit की तरफ तेजी से बढ़ रहे थे।
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