आधुनिका अध्याय 2 : Coffee, tea or me...


उस दिन फंक्शन के बाद वनिता घर की तरफ बढ़ रही थी कि अचानक उसकी नज़र बस स्टॉप पर खड़े शिरीष पर पड़ी। 'आइए मैं छोड़ देती हूं। मैं उसी तरफ ही जा रही थी' नज़र उठा कर शिरीष ने देखा तो गाड़ी का कांच नीचे किए वनिता उसी की तरफ मुखातिब थी। शिरीष गाड़ी में बैठा तो उसे अचानक ही अपनी पुरानी बाइक का ख्याल करके एक संकोच सा हुआ। फिर उसने सिर झटक कर ख्यालों से पीछा छुड़ाया और गौर से गाड़ी के अंदर की साज सज्जा को देखने लगा। वनिता की गाड़ी उसकी पद प्रतिष्ठा और सुरुचि का परिचय दे रही थी। ' ऐसे क्या देख रहे हैं शिरीष जी?' 'आपकी गाड़ी बहुत खूबसूरत है मैम।' ' शिरीष जी ये गाड़ी नहीं मेरा बचपन का सपना है। और उन दिनों की याद भी जब मेरे पास गाड़ी तो क्या दोपहिया भी नहीं हुआ करती थी। पर मैंने भी ठान लिया था कि एक दिन मैं इन सब मुसीबतों को हरा कर अपना खुद का एक मकाम हासिल करूँगी। और मैं ही क्या कोई भी मेहनत और लगन से एक सही मकाम हासिल कर सकता है।' उस रात शिरीष के कानों में बार बार वनिता की आवाज़ गूंजती रही। कितनी अर्थहीन और बेबुनियाद लग रही थीं वो सारी बातें जो उसने वनिता के बारे में सुनी थीं। घमंडी, मुंहफट, अक्खड़.. क्या सच? और शिरीष ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि एक दिन वो वनिता से लोगों की इस सोच की वजह ज़रूर पूछेगा। अगले दिन जब शिरीष ऑफिस पहुंचा तो उसकी नज़रें वनिता को ही खोज रही थीं। पर वो उस दिन तो क्या अगले चार दिन तक उसे नज़र ही नहीं आई। ऑफिस में इस बात को लेके कई तरह के तुक्के लगाए जा रहे थे। कुछ का मत था कि शायद कुछ देखने दिखाने का चक्कर है और कुछ इस बार भी उसकी पिछले साल की लंबी छुट्टी का हवाला देते हुए वनिता के दूर किसी रमणीय स्थान पर घूमने जाने के दावे पेश कर रहे थे। उन दो दलों के बीच फंसे हुए शिरीष से जब रहा नहीं गया तो चौथे दिन हिम्मत करके किसी तरह शिरीष ने उसका नम्बर मिलाया। 'यस, हू इस इट?' फ़ोन पर भी वनिता की मीठी संयमित आवाज़ ने शिरीष का ध्यान अपनी तरफ खींचा 'गुड ईवनिंग मैम। शिरीष हियर। वो आप चार दिन से ऑफिस नहीं आईं तो...' 'मैं कल आऊँगी। गुड नाईट।' शिरीष को बोलने का मौका दिए बिना वनिता ने फोन काट दिया।
अगले दिन शिरीष अपना ध्यान वनिता से हटा ही नहीं पा रहा था। उसकी आँखों में पड़े हुए काले घेरे इस बात के गवाह थे कि उसके छुट्टी के दिन आराम से नहीं बीते हैं। 'शिरीष जी आपने फ़ोन किया था कल। कुछ काम था?' वनिता का इतना पूछना था कि उसके आस पास के लोगों के कान खड़े हो गए। शिरीष ने धीरे से कहा,'हां मैम, वो नई टॉवर लोकेशन का सर्वे पूरा हो गया है। उसी की रिपोर्ट डिस्कस करनी थी।' 'ओके'
अब शिरीष और भी उलझ गया था क्योंकि वो चाह कर भी अपने कॉल करने की असली वजह इतने लोगों के सामने नहीं कह सकता था। सारा दिन इसी उधेड़बुन में रहने के बाद अचानक उसकी नज़र कॉफी शॉप के सामने खड़ी वनिता की गाड़ी पर पड़ी। उसने भी अपनी बाइक वहीं रोक दी और शॉप के अंदर दाखिल हो गया। कोने की टेबल पर वनिता एक किताब में खोई अकेली ही बैठी थी। 'गुड इवनिंग मैम' 'हेलो शिरीष जी।' 'मे आई?' 'श्योर श्योर। प्लीज हैव आ सीट।' 'आप यहां अकेले?' 'अकेले आए हैं, अकेले जाना है तो कॉफी तो अकेले एन्जॉय कर ही सकते हैं' हंस कर वनिता ने उसकी बात टाल दी। अब शिरीष से रहा नहीं गया और वो पूछ बैठा,'मैम वो आप 4 दिन छुट्टी पर थीं। आपकी तबियत तो ठीक है ना।' 'यस शिरीष मैं बिल्कुल ठीक हूँ। मैं कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हूं। उनमें से एक को खेल खेल में काफी चोट आ गई। उसके घर में कोई नहीं है उसकी माँ के अलावा। वो अकेली थी इसलिए मैंने कुछ दिन उनकी मदद कर दी।' शिरीष को ऑफिस में चल रही चर्चा याद आई और वह शर्म से सिर झुका कर अपनी कॉफी पीने लगा। शिरीष समझ ही नहीं पा रहा था कि वो कैसे बताए वनिता को कि लोग उसके बारे में क्या क्या कहते हैं। 'क्या हुआ, आप कुछ सोच में लगते हैं?' 'हां वो...' 'बोलिए बोलिए कोई बात नहीं।''वो मैम आपने किसी को कभी बताया नहीं आपके इस social cause के बारे में।' 'बताया था और लोगों को इसमें शामिल करने की कोशिश भी की। पर सच कहूं तो बहुत निराशा हुई । लोग या तो इसे पैसे कमाने के ज़रिए की तरह देखते हैं या फिर प्रसिद्धि की भूख के कारण ज़मीनी काम करने के बजाए शोबाज़ी में अपने असल मकसद को भूल जाते हैं। इसलिए मैं फिलहाल खुद ही ये काम कर रही हूं।'
उस रात शिरीष सो नहीं सका। उसे याद आ रहा था उसके पापा के देहांत के बाद लोगों ने किस तरह उससे मुंह मोड़ लिया था हर कोई बस उसे दया या संकोच की नज़र से ही देखता था। या फिर जब पापा के दफ्तर से उनका अनुदान मिला तो लालच से। उसके आंसूं पोछने वाला या कम से कम उसे हिम्मत दिलाने वाला कोई नहीं था। अकेले ही तय किया था ये सफर उसने। काश उसे भी मिला होता कोई वनिता जैसा दोस्त या हमदर्द। तो शायद उसे भी अपनी ज़िंदगी थोड़ी आसान लगती।


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