आधुनिका अध्याय 8 हाथ जोड़ते हैं


हे ईश्वर
क्या तुमने मेरी ज़िन्दगी में सफर ही सफर लिखा है, कोई मंज़िल नहीं? क्यों मुझे ऐसे ही लोग मिलते हैं मरीचिका जैसे। प्यासी क्यों नहीं मर जाती मैं इन सब के पीछे भागते भागते। न थकती हूँ न रुकती हूं। बस चलती ही जा रही हूं। बहुतों की छांव हूं मैं पर मेरी राहत कोई नहीं। एक दिन एक पल का सुकून किसी ने नहीं दिया। केवल इल्ज़ाम और ताने। जिद्द का आलम ये कि मैं मना भी कर दूं तो मेरे पास आने की ज़िद और जब मुझे आदत सी हो जाती है तो दूर जाने की ज़िद। इन ज़िदों के बीच में मेरी मासूम सी ख्वाहिशें कहाँ पनपेंगी? कुम्हला गयी हैं सारी भगवान। ये सच है कि मेरा प्यार किसी रस्मो रिवाज़ का मोहताज नहीं है। पर ये भी सच है कि किसी ने कभी इस इरादे से मेरा हाथ थामा ही नहीं। मैंने क्यों नहीं रोका? क्योंकि ये मेरा काम नहीं है, आपका है। आप जो सब कुछ देखते हैं, जानते हैं। रोकते क्यों नहीं ऐसे लोगों को मेरी ज़िंदगी में आने से ? या फिर आने के बाद मेरी ज़िंदगी से जाने से? मैंने तो सिर्फ प्यार किया था, आप ने इतनी नफरत क्यों की मुझसे?
भगवान के आगे हाथ जोड़े वनिता न जाने क्या क्या कहती जा रही थी। वनिता जो समाज के सामने मज़बूती और हिम्मत से खड़ी थी आज न जाने क्यों इतनी कमज़ोर पड़ गई थी। कोई नहीं था जैसे उसका और न वो किसी के पास थी। प्यार था, परवाह थी पर एक दिन अतीत ने उससे सब छीन लिया और एक बार फिर सब कुछ देकर उसके हाथ खाली के  खाली ही रहे। शिरीष ने एक बार फिर उससे झगड़ा किया, उसे ताने ही ताने सुनाए और फिर चला गया। उसकी आँखों में आसुओं की झड़ी लग गई पर शिरीष को रहम नहीं आया। वो कहता रहा, कहता ही रहा। आपको एक पति नहीं एक नौकर चाहिए जो दिन भर उनके आगे पीछे घूमता रहे। मैं आपके आगे पीछे घूमने वाला शर्मा नहीं हूं जिसे आप instructions देती फिरें। ऑफिस का रुबाब ऑफिस में दिखाइए। आप को आपके पैसे का रुतबे का और शानो शौकत का घमंड है पर मुझे इसका कोई लालच नहीं। आपकी दौलत को मैं ठोकर मारता हूं, मेरे लिए वो पैरों की धूल भी नहीं। ये वही दौलत थी जिसे कमाने का अधिकार वनिता ने इतना संघर्ष करके पाया था।
वनिता सोचती जा रही थी कि सब कुछ इतने प्यार से शुरू हुआ था। कितनी फिक्र थी शिरीष को उसकी। कितनी कदर थी उसकी उपलब्धियों की। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि सब इतना बदल गया। उसका आत्म सम्मान अचानक शिरीष को घमंड लगने लगा और उसकी आत्मनिर्भरता एक दिखावा।
किसी भी पढ़ी लिखी लड़की के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये नहीं होती कि वो समाज में अपना एक स्थान बनाए, अपनी पहचान बनाए। उसे हर कदम पर एक नया स्पष्टीकरण देना होता है। किसी पुरुष के लिए कैरियर में सफल होना और समाज में अपना स्थान बनाना हमें कितना जरूरी लगता है। पर वही पुरुष किसी पढ़ी लिखी आत्मनिर्भर स्त्री को क्यों नहीं बर्दाश्त कर सकता। कैरियर की रेस में हर एक पुरुष का उत्साहवर्धन करता है। उसकी सफलता से खुश और असफलता से निराश होता है। पर स्त्री की सफलता के पीछे अक्सर ओछे और गलीज़ कारण गिनाए जाते हैं। असफलता पर समाज को एक किस्म की प्रसन्नता ही होती है। उसके हिसाब से तो कैरियर में आगे बढ़ना एक किस्म का शौक ही है स्त्री का कोई वाजिब ज़रूरत नहीं। हां, घर में सबसे बड़ी हो, परिवार का कोई मुखिया न हो, अकेली हो या फिर कोई सरपरस्त न हो - कुल मिला कर उसकी कोई न कोई भयंकर सी मजबूरी हो तब स्त्री को सम्मान मिलता है।
ऐसे में मेरे जैसी स्त्रियां क्या करें? जिनकी नौकरी के पीछे उनकी कोई मजबूरी नहीं। जो तहेदिल से अपने लिए एक मुकाम पाना चाहती हैं। जिन्होंने उतनी ही मेहनत की है जितनी एक पुरुष करता है। शायद ज़्यादा ही क्योंकि खुद को साबित करने की जितनी आवश्यकता एक स्त्री को होती है उतनी शायद किसी पुरुष को नहीं। घर से बाहर निकले हुए हमारे कदम हमेशा लोगों को भटके हुए ही लगते हैं। पुरुष के लिए तो पूरा बाजार सजा रखा है। विवाह से पहले एकाध अदद प्रेमिका, एक सजी संवरी बीवी और जब उससे भी उकता जाए तो विवाहेतर संबंध। वहीं स्त्री का एक स्नेहिल रिश्ता भी समाज से सहा नहीं जाता। बड़ा ही अनपढ़ किस्म का समाज है जिसे प्रेमिका और नगरवधू में फर्क करना ही नहीं आता। जो घरों के अंदर होते बलात्कार को तो अनदेखा कर देता है, अनसुना कर देता है घुटी घुटी वो चीखें। लेकिन समाज में अपनी इच्छा से किसी को अपना सब कुछ समर्पित करने वाली स्त्री उसके लिए कुलटा ही है।
कब बदलेगा तुम्हारा समाज भगवान? क्या मेरे जैसी अनगिनत वनिताओं के लिए ये घुटन भरी ज़िन्दगी ही आपने लिखी है?


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