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आधुनिका अध्याय 7 आज भी अतीत

शर्मा, साहनी और ऑफिस के लोग दो गुटों में बंट चुके थे। जहां एक वर्ग को उनके रिश्ते से सख्त एतराज़ था और वो गाहे बगाहे इसे दबे ढंके शब्दों में ज़ाहिर भी कर देते। वनिता से सीधे बात करने का अंजाम वो जानते थे इसलिए शिरीष ही उनकी बातों का निशाना बना रहता था। वहीं दूसरा गुट तटस्थ रहकर चुपचाप तमाशा देख रहा था। कभी उनकी कोशिशें रंग दिखातीं तो शिरीष ज़रा ज़रा सी बातों या बिना बात के भी मुंह फुला लेता। वनिता एक बार फिर उसे अपने प्यार मनुहार से मना लेती और भगवान का शुक्र अदा करती। वनिता को शिरीष की समझदारी और प्रगतिशील सोच पर बड़ा भरोसा था और वो सोचती थी कि शिरीष भी इन सब साज़िशों से अनजान नहीं है। उसे ये भी लगता था कि उसका एकनिष्ठ समर्पण और संतुलित व्यवहार शिरीष के मन में सर उठाती शंकाओं का निवारण कर ही लेगा। वनिता के फ़ोन के स्क्रीन पर अमेय का नाम फ़्लैश हुआ और शिरीष कॉफी टेबल से उठ कर बिना कुछ कहे बाहर की तरफ बढ़ गया। उसके इस व्यवहार के कारण से अनजान वनिता तेज़ी से बिल देकर उसके पीछे पीछे बाहर की तरफ आ गई। 'क्या हुआ शिरीष?' 'आप आज भी उस अमेय से बात करती हैं। उसी के साथ रहने का इरादा...

आधुनिका अध्याय 6 शर्म आती है मगर....

वनिता और शिरीष का प्यार परवान चढ़ा तो दोनों के चर्चे पूरे ऑफिस में होने लगे। सबकी नजरों में उनका प्यार एक वर्जित फल था। जहां लोगों ने अचानक वनिता की शादी और उसके आने वाले रिश्तों में ज़रुरत से ज़्यादा दिलचस्पी दिखाना शुरू किया वहीं शिरीष को दबे ढंके तानों का निशाना बनाया जा रहा था। शर्मा और साहनी साहब यथायक्ति वनिता के लिए अपने मन में भरा ज़हर उगलते रहते थे। इन सब से बेखबर वनिता अपनी शादी और शिरीष के साथ अपने भविष्य के सपने सजाए तैयारियां करने लगी थी। शिरीष और उसके दो भाईयों का बेहद छोटा सा परिवार था। पापा के बाद अपने घर को सम्भालने की कोशिश करते शिरीष को वनिता के रूप में वो साथी मिला जिस पर वो आंख बंद करके भरोसा करने लगा था। वनिता जिसकी ज़िन्दगी में सुनहरे सपनों और अलमारी में प्यारी प्यारी साड़ियों ने एक अरसे बाद जगह बनाई थी इन सब से बेखबर शिरीष के साथ को पूरी तरह महसूस करने और अपनी ज़िंदगी के इस ख़ूबसूरत दौर को जीने में लगी हुई थी। पर वनिता इस सच से अनजान थी कि उसकी पीठ पीछे उसके लिए एक ऐसा जाल बुना जा रहा था जिसमें फंस कर उसका भविष्य और शिरीष के साथ उसका रिश्ता दोनों ही अंधकारमय होन...

आधुनिका अध्याय 5 रवायतें

इस कहानी के कुछ हिस्से और भाषा 18 वर्ष से कम उम्र के पाठकों के लिए उचित नहीं हैं। Reader discretion advised.                                                     उस दिन कॉफी शॉप में वनिता का अतीत जानने के बाद शिरीष एक अजीब सी कशमकश में फंस गया था। एक तरफ तो वनिता की खूबसूरती और नेक सीरत उसे आकर्षित कर रहे थे वहीं दूसरी तरफ उसका अतीत उसे रोकने लगा था। वो जब भी बात करते शिरीष की आंखों के सामने वो अंजान चेहरा एक साये की तरह आ जाता । अनिर्णय की स्थिति में भी वनिता से बात करना और उसके साथ समय बिताना शिरीष ने छोड़ा नहीं था। उसकी नेक सीरत, उसका आत्मविश्वास और उसके गुण धीरे धीरे उसके दिल में जगह बना रहे थे। इसके साथ ही वनिता हमेशा शिरीष को कुछ अलग करने को प्रेरित करती रहती थी। समय पर सब कुछ छोड़ कर शिरीष ने इस सैलाब में बहते जाने का निर्णय किया। 'है बड़ी जानदार चीज़! मज़ा आ गया कल।' पीछे से आते शिरीष को कनखियों से...

आधुनिका अध्याय 4 धोखा था

                           शिरीष और वनिता की कॉफ़ी शॉप की मुलाकातें अब अक्सर होने लगीं। बहुत वक़्त बाद एक अच्छा दोस्त मिला था वनिता को जिसके साथ वो खुल कर बात कर पा रही थी। वहीं शिरीष को उसके ज्ञान और अनुभव से काफी कुछ सीखने को मिलता था। तीन साल का उम्र का अंतर और ऑफिस में उनके बीच का फासला भी उनकी दोस्ती के आड़े नहीं आ सका था। जैसे जैसे वनिता उससे खुलती जा रही थी शिरीष की झिझक धीरे धीरे खत्म होने लगी। एक दिन उसने हिम्मत करके वनिता से वो सवाल पूछ ही लिया जो न जाने कब से उसे परेशान कर रहा था 'मैम आपने अब तक शादी क्यों नहीं की?' वनिता की लंबी चुप्पी से घबरा कर शिरीष ने उससे कहा 'सॉरी मैम, मैं शायद कुछ ज़्यादा बोल गया।' ' नहीं शिरीष, बात वो नहीं है। बस इतना वक़्त हो गया इस बात को इसलिए सोच रही थी कहां से शुरू करूं। मैंने शुरू से ही यह सोच रखा था कि मैं सबसे पहले अपने कैरियर को प्राथमिकता दूंगी। जब तक मैं अपने लक्ष्य को नहीं पा लेती तब तक ऐसा कुछ नहीं सोचूंगी। कहने को आज की दुनिया में लोग प्रगतिशील हो गए हैं और लड़कियों क...

आधुनिका अध्याय 3 : घमंडी लड़की

'ये क्या है शर्मा जी! मैंने कई बार आपसे कहा है कि अर्जेंट फाइलें उसी दिन क्लियर कर दिया कीजिये। बड़े साहब चार दिन से इस फ़ाइल के बारे में पूछ रहे हैं।' मेज़ पर एक फ़ाइल पटकते हुए वनिता ने अपने PA से ऊंचे स्वर में पूछा। कल ही तो शर्मा जी कैंटीन में सबको कह रहे थे 'वनिता मैम तो वही करती हैं जैसा मैं बताता हूँ। खुद से तो कुछ कर ही नहीं पातीं।' आज पूरा ऑफिस खामोशी से उनके खोखले दावों की धज्जियां उड़ते हुए देख रहा था। शर्मा जी उस वक़्त तो कुछ बोल न सके पर उस दिन के बाद से वनिता के लिए उनकी आंखों में और ज़ुबान में बेइंतेहा नफरत भर गई। 'मे आई?' शिरीष ने हौले से पूछा तो किताब से नज़रें उठा कर वनिता ने धीरे से उसे बैठने का ईशारा किया। 'मैम आपको नहीं लगता उनकी गलती इतनी बड़ी नहीं थी।' शिरीष ने अपनी राय रखी। वनिता ने धीरे से कहा ' शिरीष जी ये कोई पहली बार नहीं है कि किसी से इज़्ज़त और विनम्रता से पेश आने और विश्वास करने का नतीजा हमें भुगतना पड़ रहा है। दूसरी बात ये है कि हमारे लिए कोई काम कितना भी छोटा हो उससे किसी न किसी की ज़रूरत जुड़ी हुई है। इस बात को और कंपनी की...

आधुनिका अध्याय 2 : Coffee, tea or me...

उस दिन फंक्शन के बाद वनिता घर की तरफ बढ़ रही थी कि अचानक उसकी नज़र बस स्टॉप पर खड़े शिरीष पर पड़ी। 'आइए मैं छोड़ देती हूं। मैं उसी तरफ ही जा रही थी' नज़र उठा कर शिरीष ने देखा तो गाड़ी का कांच नीचे किए वनिता उसी की तरफ मुखातिब थी। शिरीष गाड़ी में बैठा तो उसे अचानक ही अपनी पुरानी बाइक का ख्याल करके एक संकोच सा हुआ। फिर उसने सिर झटक कर ख्यालों से पीछा छुड़ाया और गौर से गाड़ी के अंदर की साज सज्जा को देखने लगा। वनिता की गाड़ी उसकी पद प्रतिष्ठा और सुरुचि का परिचय दे रही थी। ' ऐसे क्या देख रहे हैं शिरीष जी?' 'आपकी गाड़ी बहुत खूबसूरत है मैम।' ' शिरीष जी ये गाड़ी नहीं मेरा बचपन का सपना है। और उन दिनों की याद भी जब मेरे पास गाड़ी तो क्या दोपहिया भी नहीं हुआ करती थी। पर मैंने भी ठान लिया था कि एक दिन मैं इन सब मुसीबतों को हरा कर अपना खुद का एक मकाम हासिल करूँगी। और मैं ही क्या कोई भी मेहनत और लगन से एक सही मकाम हासिल कर सकता है।' उस रात शिरीष के कानों में बार बार वनिता की आवाज़ गूंजती रही। कितनी अर्थहीन और बेबुनियाद लग रही थीं वो सारी बातें जो उसने वनिता के बारे में सुनी थीं...

आधुनिका : story of a working woman अध्याय 1 ये शादी नहीं हो सकती

कामकाजी लड़कियों को लेकर समाज में कई तरह की धारणाएं बनी हुई हैं। यह कहानी उसका खंडन करने का एक छोटा सा प्रयास है। इस कहानी के पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं पर वास्तविकता से कहीं न कहीं प्रेरित हैं।                        अध्याय 1 ये शादी नहीं हो सकती वनिता ने फ़ोन उठाया और इससे पहले कि उसका इरादा बदल जाए, उसने कॉल बटन दबा दिया। फोन की घंटी बजते बजते थक कर बंद होने ही वाली थी कि शिरीष की झुंझलाई हुई Hello' उसके कानों में पड़ी और एक बार फिर उसकी आँखों में आंसू छलक आए। पिछले कुछ दिनों से उसकी आंखें वक़्त बेवक़्त बरसती ही रहती थीं। किसी तरह खुद पर काबू पाकर वनिता ने कहा 'क्या ये तुम्हारा अंतिम निर्णय है?' शिरीष फट पड़ा ' हां! ये मेरा अंतिम निर्णय है। ये शादी नहीं हो सकती। तुम मेरे घरवालों को ज़रा भी पसंद नहीं हो और सच कहूं तो मुझे भी। तुम ऐसी लड़की हो ही नहीं जो किसी का घर सजा सके। तुम तो बस अपने होठों पर मुस्कान सजा कर रोज़ काम पर निकल जाती हो। पीछे छूटे घर से बेपरवाह। मां ने तो पहले ही कहा था कामकाजी लड़कियों से दूर रहने के...