आधुनिका अध्याय 7 आज भी अतीत
शर्मा, साहनी और ऑफिस के लोग दो गुटों में बंट चुके थे। जहां एक वर्ग को उनके रिश्ते से सख्त एतराज़ था और वो गाहे बगाहे इसे दबे ढंके शब्दों में ज़ाहिर भी कर देते। वनिता से सीधे बात करने का अंजाम वो जानते थे इसलिए शिरीष ही उनकी बातों का निशाना बना रहता था। वहीं दूसरा गुट तटस्थ रहकर चुपचाप तमाशा देख रहा था। कभी उनकी कोशिशें रंग दिखातीं तो शिरीष ज़रा ज़रा सी बातों या बिना बात के भी मुंह फुला लेता। वनिता एक बार फिर उसे अपने प्यार मनुहार से मना लेती और भगवान का शुक्र अदा करती। वनिता को शिरीष की समझदारी और प्रगतिशील सोच पर बड़ा भरोसा था और वो सोचती थी कि शिरीष भी इन सब साज़िशों से अनजान नहीं है। उसे ये भी लगता था कि उसका एकनिष्ठ समर्पण और संतुलित व्यवहार शिरीष के मन में सर उठाती शंकाओं का निवारण कर ही लेगा। वनिता के फ़ोन के स्क्रीन पर अमेय का नाम फ़्लैश हुआ और शिरीष कॉफी टेबल से उठ कर बिना कुछ कहे बाहर की तरफ बढ़ गया। उसके इस व्यवहार के कारण से अनजान वनिता तेज़ी से बिल देकर उसके पीछे पीछे बाहर की तरफ आ गई। 'क्या हुआ शिरीष?' 'आप आज भी उस अमेय से बात करती हैं। उसी के साथ रहने का इरादा...