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Showing posts from February, 2020

आधुनिका अध्याय 12 तुम्हारे लिए

                           शिरीष का फोन काटने के बाद वनिता को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे। वो चाहती तो उसे धूल में मिला सकती थी। उसकी नौकरी और प्रतिष्ठा को चोट पहुंचा सकती थी। एक शिकायत करके उसके इस खोखले दावे की हवा निकाल सकती थी कि वनिता उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। पर वो शिरीष को बेहद प्यार करती थी इसलिए उसने एक आखिरी कोशिश करने का निश्चय किया। वो शिरीष के घर पहुंच गई। ' प्रणाम मां।' वनिता को अपने घर आया देख कर शिरीष चौंक गया। ' प्लीज बैठिए। आपसे कुछ बात करनी है।' 'मां मेरा नाम वनिता है। मैं शिरीष के साथ काम करती हूं। ' ' हाँ, बताया था उसने तुम्हारे बारे में।' ' मां मैं जो कहने जा रही हूं शायद आपको मेरी बेअदबी लगे लेकिन मेरे पास अब और कोई रास्ता नहीं है। मैं और शिरीष एक दूसरे को पसंद करते हैं. शादी भी करना चाहते हैं।पर शिरीष के लिए आपकी इच्छा ही सब कुछ है माँ। मैं जानती हूं आपने मेरे बारे  में अच्छी बातें नहीं सुनी। पर सच ये है कि वो सब लोगों की ईर्ष्या में लगाई हुई आग है। मैं असलियत में वैसी नहीं ह...

आधुनिका अध्याय 12 दिशाहीन

मेरे प्रिय साथियों क्या लिखूँ?  इस कहानी के दो अंत हो सकते हैं. एक वो जो हक़ीक़त में हुआ था और एक रोमांटिक सा कहानीकार की सुखद कल्पना में डूबा। मेरी दोस्त ने कहा था सच्चाई लिखो। पर मैं चाहती हूं वनिता और उसके जैसी हज़ारों लाखों लड़कियों के मन में एक उम्मीद जगाना। इसलिए मैं दोनों लिखती हूँ.. आपको जो पसंद आए स्वीकार कर लीजिए। पर मुझे ज़रूर बताइएगा आपको कौन सा ज्यादा पसंद आया।                             आज शिरीष फिर बस स्टॉप पर खड़ा था। आज भी वही बारिश थी और वही वनिता की कार। बस अंतर इतना था कि आज वनिता ने हंस कर उसे hello नहीं कहा। न ही उसके लिए गाड़ी रोकी और न उसे घर छोड़ने को कहा। अनायास ही वनिता से हुई अंतिम मुलाकात उसकी आंखों के आगे आ गई... वनिता हाथ में शिरीष की शादी का card लिए हाथ जोड़े उसकी मां के आगे विनती सी कर रही थी। माँ प्लीज ऐसा मत कीजिए। मैं आपके बेटे को बेहद प्यार करती हूं।' 'जो कुछ भी हुआ उसमें गलती तुम्हारी ही है। इतने साल उसके साथ घूमने फिरने से पहले एक बार पूछ तो लेती कि तुम जैसी लड़की के साथ ...

अध्याय 11 मैं हूँ न

                              वनिता की ज़िंदगी में शिरीष की जगह और अहमियत दोनों बढ़ते जा रहे थे। ऑफिस में भी सभी शिरीष के प्रति वनिता के आदर और लगाव को महसूस कर सकते थे। वो जहां भी जाती दबी जुबान में लोग उसके और शिरीष के बारे में चर्चा किया करते थे। पर वनिता से सीधे कुछ भी कहने की हिम्मत शायद किसी की नहीं थी।परंतु  शिरीष गाहे बगाहे लोगों के तानों का शिकार होता जा रहा था। अजीब बात है कि हम कहने को तो अपनी निजी जिंदगी में किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करते। पर वही हम शादी और जीवनसाथी जैसे महत्वपूर्ण निर्णय में परिवार, समाज और प्रचलित मान्यताओं पर इंसान के नैसर्गिक गुणों से ज़्यादा भरोसा करते हैं। साहसी से साहसी लोग भी जाति, धर्म , उम्र और कुंडली के फेर से बच नहीं पाते। ऐसा ही शिरीष का हाल था। हर पल वनिता के साथ रहने और उसके द्वारा प्रेम, स्नेह और आदर देने के बावजूद वह वनिता से शादी करने के अपने निर्णय पर पछता रहा था। उसे इस बात की भी परवाह नहीं रही कि वनिता की छवि पर इसका क्या प्रभाव होगा। वह अपने परि...

आधुनिका अध्याय 10 बिना बाप का लड़का

वनिता और शिरीष की ज़िंदगी के तूफान थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। शिरीष की पसंद पर उसके घरवालों की सहमति की मुहर लगने में काफी अड़चनें थीं। 2 साल से शिरीष और वनिता साथ थे। अब वनिता के मन में दबी हुई आशंकाओं ने सर उठाना शुरू किया। वो शिरीष से जब भी पूछती शिरीष कोई न कोई बहाना बना कर उसे टाल देता। वनिता आज के ज़माने की लड़की थी। उसके लिए शादी कोई लेन देन या समझौता नहीं, वो बन्धन था जिसमें वो स्वेच्छा से बंधना चाहती थी। पर शिरीष आज भी समाज और परिवार की दुहाई दे रहा था। इसी बीच एक दिन वनिता के सब्र का बांध टूट गया। ' शिरीष तुम घर पर कब बात करोगे?' 'वनिता असल में आपकी उम्र...!!' 'मेरी उम्र क्या? आपको रिश्ता बनाने से पहले नहीं पता था मेरी उम्र का?' 'पता था पर मुझे एहसास नहीं था कि मेरे घरवाले इस कदर अड़ जाएंगे।' 'मनाओ उन्हें शिरीष। मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूं। तुम्हें कभी खोना नहीं चाहती। एक बार शादी हो गई फिर सब ठीक हो जाएगा।' ' कुछ ठीक नहीं होगा। मैंने आपसे शादी की तो मेरे घरवाले हमेशा के लिए मुझसे रिश्ता तोड़ लेंगे।' ' तुम कहना ...

आधुनिका अध्याय 9 : प्यार के लिए

           कॉफी का कप हाथ में लिए वनिता अतीत में खो गई। आज जो शिरीष उसे घमंडी और दिखावेबाज़ कह रहा था, उसी शिरीष ने कभी उसकी उपलब्धियों से प्रभावित होकर उसका हाथ थामने की गुजारिश की थी। वनिता सोच रही थी कि स्त्री और पुरुष के लिए कितने अलग नियम कायदे हैं। उसने कभी अपने स्त्री होने पर न तो अफसोस किया था न ही कभी इस बात को अपने राह की बेड़ी बनने दी थी। पर आज शिरीष के बदलते व्यवहार के कारण वो सोचने पर मजबूर हो गई थी। जब कोई पुरूष किसी उच्च पद को सुशोभित करता है तो कितनी आसानी से उसके विवाह के लिए रास्ते खुले होते हैं। वो अपने समकक्ष या कमतर किसी से भी आसानी से विवाह कर सकता है। बल्कि अपने से आर्थिक या सामाजिक स्तर में थोड़े निचले पावदान में रिश्ता जोड़ने पर उसकी मान प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। लेकिन वहीं स्त्री अगर अपने कैरियर में एक सम्मानजनक स्थिति में हो तो अपने से ऊंचा ही उसको देखना पड़ता है। बल्कि उसके रास्ते में ये कह कर और कांटे बिछाए जाते हैं कि कैरियर को समर्पित स्त्री में वो घरेलूपन और वो विनम्रता होती ही नहीं जो एक घर बनाने के लिए ज़रूरी है। वनिता ने नज़र...

आधुनिका अध्याय 8 हाथ जोड़ते हैं

हे ईश्वर क्या तुमने मेरी ज़िन्दगी में सफर ही सफर लिखा है, कोई मंज़िल नहीं? क्यों मुझे ऐसे ही लोग मिलते हैं मरीचिका जैसे। प्यासी क्यों नहीं मर जाती मैं इन सब के पीछे भागते भागते। न थकती हूँ न रुकती हूं। बस चलती ही जा रही हूं। बहुतों की छांव हूं मैं पर मेरी राहत कोई नहीं। एक दिन एक पल का सुकून किसी ने नहीं दिया। केवल इल्ज़ाम और ताने। जिद्द का आलम ये कि मैं मना भी कर दूं तो मेरे पास आने की ज़िद और जब मुझे आदत सी हो जाती है तो दूर जाने की ज़िद। इन ज़िदों के बीच में मेरी मासूम सी ख्वाहिशें कहाँ पनपेंगी? कुम्हला गयी हैं सारी भगवान। ये सच है कि मेरा प्यार किसी रस्मो रिवाज़ का मोहताज नहीं है। पर ये भी सच है कि किसी ने कभी इस इरादे से मेरा हाथ थामा ही नहीं। मैंने क्यों नहीं रोका? क्योंकि ये मेरा काम नहीं है, आपका है। आप जो सब कुछ देखते हैं, जानते हैं। रोकते क्यों नहीं ऐसे लोगों को मेरी ज़िंदगी में आने से ? या फिर आने के बाद मेरी ज़िंदगी से जाने से? मैंने तो सिर्फ प्यार किया था, आप ने इतनी नफरत क्यों की मुझसे? भगवान के आगे हाथ जोड़े वनिता न जाने क्या क्या कहती जा रही थी। वनिता जो समाज के सामने मज़ब...

आधुनिका अध्याय 7 आज भी अतीत

शर्मा, साहनी और ऑफिस के लोग दो गुटों में बंट चुके थे। जहां एक वर्ग को उनके रिश्ते से सख्त एतराज़ था और वो गाहे बगाहे इसे दबे ढंके शब्दों में ज़ाहिर भी कर देते। वनिता से सीधे बात करने का अंजाम वो जानते थे इसलिए शिरीष ही उनकी बातों का निशाना बना रहता था। वहीं दूसरा गुट तटस्थ रहकर चुपचाप तमाशा देख रहा था। कभी उनकी कोशिशें रंग दिखातीं तो शिरीष ज़रा ज़रा सी बातों या बिना बात के भी मुंह फुला लेता। वनिता एक बार फिर उसे अपने प्यार मनुहार से मना लेती और भगवान का शुक्र अदा करती। वनिता को शिरीष की समझदारी और प्रगतिशील सोच पर बड़ा भरोसा था और वो सोचती थी कि शिरीष भी इन सब साज़िशों से अनजान नहीं है। उसे ये भी लगता था कि उसका एकनिष्ठ समर्पण और संतुलित व्यवहार शिरीष के मन में सर उठाती शंकाओं का निवारण कर ही लेगा। वनिता के फ़ोन के स्क्रीन पर अमेय का नाम फ़्लैश हुआ और शिरीष कॉफी टेबल से उठ कर बिना कुछ कहे बाहर की तरफ बढ़ गया। उसके इस व्यवहार के कारण से अनजान वनिता तेज़ी से बिल देकर उसके पीछे पीछे बाहर की तरफ आ गई। 'क्या हुआ शिरीष?' 'आप आज भी उस अमेय से बात करती हैं। उसी के साथ रहने का इरादा...

आधुनिका अध्याय 6 शर्म आती है मगर....

वनिता और शिरीष का प्यार परवान चढ़ा तो दोनों के चर्चे पूरे ऑफिस में होने लगे। सबकी नजरों में उनका प्यार एक वर्जित फल था। जहां लोगों ने अचानक वनिता की शादी और उसके आने वाले रिश्तों में ज़रुरत से ज़्यादा दिलचस्पी दिखाना शुरू किया वहीं शिरीष को दबे ढंके तानों का निशाना बनाया जा रहा था। शर्मा और साहनी साहब यथायक्ति वनिता के लिए अपने मन में भरा ज़हर उगलते रहते थे। इन सब से बेखबर वनिता अपनी शादी और शिरीष के साथ अपने भविष्य के सपने सजाए तैयारियां करने लगी थी। शिरीष और उसके दो भाईयों का बेहद छोटा सा परिवार था। पापा के बाद अपने घर को सम्भालने की कोशिश करते शिरीष को वनिता के रूप में वो साथी मिला जिस पर वो आंख बंद करके भरोसा करने लगा था। वनिता जिसकी ज़िन्दगी में सुनहरे सपनों और अलमारी में प्यारी प्यारी साड़ियों ने एक अरसे बाद जगह बनाई थी इन सब से बेखबर शिरीष के साथ को पूरी तरह महसूस करने और अपनी ज़िंदगी के इस ख़ूबसूरत दौर को जीने में लगी हुई थी। पर वनिता इस सच से अनजान थी कि उसकी पीठ पीछे उसके लिए एक ऐसा जाल बुना जा रहा था जिसमें फंस कर उसका भविष्य और शिरीष के साथ उसका रिश्ता दोनों ही अंधकारमय होन...

आधुनिका अध्याय 5 रवायतें

इस कहानी के कुछ हिस्से और भाषा 18 वर्ष से कम उम्र के पाठकों के लिए उचित नहीं हैं। Reader discretion advised.                                                     उस दिन कॉफी शॉप में वनिता का अतीत जानने के बाद शिरीष एक अजीब सी कशमकश में फंस गया था। एक तरफ तो वनिता की खूबसूरती और नेक सीरत उसे आकर्षित कर रहे थे वहीं दूसरी तरफ उसका अतीत उसे रोकने लगा था। वो जब भी बात करते शिरीष की आंखों के सामने वो अंजान चेहरा एक साये की तरह आ जाता । अनिर्णय की स्थिति में भी वनिता से बात करना और उसके साथ समय बिताना शिरीष ने छोड़ा नहीं था। उसकी नेक सीरत, उसका आत्मविश्वास और उसके गुण धीरे धीरे उसके दिल में जगह बना रहे थे। इसके साथ ही वनिता हमेशा शिरीष को कुछ अलग करने को प्रेरित करती रहती थी। समय पर सब कुछ छोड़ कर शिरीष ने इस सैलाब में बहते जाने का निर्णय किया। 'है बड़ी जानदार चीज़! मज़ा आ गया कल।' पीछे से आते शिरीष को कनखियों से...

आधुनिका अध्याय 4 धोखा था

                           शिरीष और वनिता की कॉफ़ी शॉप की मुलाकातें अब अक्सर होने लगीं। बहुत वक़्त बाद एक अच्छा दोस्त मिला था वनिता को जिसके साथ वो खुल कर बात कर पा रही थी। वहीं शिरीष को उसके ज्ञान और अनुभव से काफी कुछ सीखने को मिलता था। तीन साल का उम्र का अंतर और ऑफिस में उनके बीच का फासला भी उनकी दोस्ती के आड़े नहीं आ सका था। जैसे जैसे वनिता उससे खुलती जा रही थी शिरीष की झिझक धीरे धीरे खत्म होने लगी। एक दिन उसने हिम्मत करके वनिता से वो सवाल पूछ ही लिया जो न जाने कब से उसे परेशान कर रहा था 'मैम आपने अब तक शादी क्यों नहीं की?' वनिता की लंबी चुप्पी से घबरा कर शिरीष ने उससे कहा 'सॉरी मैम, मैं शायद कुछ ज़्यादा बोल गया।' ' नहीं शिरीष, बात वो नहीं है। बस इतना वक़्त हो गया इस बात को इसलिए सोच रही थी कहां से शुरू करूं। मैंने शुरू से ही यह सोच रखा था कि मैं सबसे पहले अपने कैरियर को प्राथमिकता दूंगी। जब तक मैं अपने लक्ष्य को नहीं पा लेती तब तक ऐसा कुछ नहीं सोचूंगी। कहने को आज की दुनिया में लोग प्रगतिशील हो गए हैं और लड़कियों क...

आधुनिका अध्याय 3 : घमंडी लड़की

'ये क्या है शर्मा जी! मैंने कई बार आपसे कहा है कि अर्जेंट फाइलें उसी दिन क्लियर कर दिया कीजिये। बड़े साहब चार दिन से इस फ़ाइल के बारे में पूछ रहे हैं।' मेज़ पर एक फ़ाइल पटकते हुए वनिता ने अपने PA से ऊंचे स्वर में पूछा। कल ही तो शर्मा जी कैंटीन में सबको कह रहे थे 'वनिता मैम तो वही करती हैं जैसा मैं बताता हूँ। खुद से तो कुछ कर ही नहीं पातीं।' आज पूरा ऑफिस खामोशी से उनके खोखले दावों की धज्जियां उड़ते हुए देख रहा था। शर्मा जी उस वक़्त तो कुछ बोल न सके पर उस दिन के बाद से वनिता के लिए उनकी आंखों में और ज़ुबान में बेइंतेहा नफरत भर गई। 'मे आई?' शिरीष ने हौले से पूछा तो किताब से नज़रें उठा कर वनिता ने धीरे से उसे बैठने का ईशारा किया। 'मैम आपको नहीं लगता उनकी गलती इतनी बड़ी नहीं थी।' शिरीष ने अपनी राय रखी। वनिता ने धीरे से कहा ' शिरीष जी ये कोई पहली बार नहीं है कि किसी से इज़्ज़त और विनम्रता से पेश आने और विश्वास करने का नतीजा हमें भुगतना पड़ रहा है। दूसरी बात ये है कि हमारे लिए कोई काम कितना भी छोटा हो उससे किसी न किसी की ज़रूरत जुड़ी हुई है। इस बात को और कंपनी की...

आधुनिका अध्याय 2 : Coffee, tea or me...

उस दिन फंक्शन के बाद वनिता घर की तरफ बढ़ रही थी कि अचानक उसकी नज़र बस स्टॉप पर खड़े शिरीष पर पड़ी। 'आइए मैं छोड़ देती हूं। मैं उसी तरफ ही जा रही थी' नज़र उठा कर शिरीष ने देखा तो गाड़ी का कांच नीचे किए वनिता उसी की तरफ मुखातिब थी। शिरीष गाड़ी में बैठा तो उसे अचानक ही अपनी पुरानी बाइक का ख्याल करके एक संकोच सा हुआ। फिर उसने सिर झटक कर ख्यालों से पीछा छुड़ाया और गौर से गाड़ी के अंदर की साज सज्जा को देखने लगा। वनिता की गाड़ी उसकी पद प्रतिष्ठा और सुरुचि का परिचय दे रही थी। ' ऐसे क्या देख रहे हैं शिरीष जी?' 'आपकी गाड़ी बहुत खूबसूरत है मैम।' ' शिरीष जी ये गाड़ी नहीं मेरा बचपन का सपना है। और उन दिनों की याद भी जब मेरे पास गाड़ी तो क्या दोपहिया भी नहीं हुआ करती थी। पर मैंने भी ठान लिया था कि एक दिन मैं इन सब मुसीबतों को हरा कर अपना खुद का एक मकाम हासिल करूँगी। और मैं ही क्या कोई भी मेहनत और लगन से एक सही मकाम हासिल कर सकता है।' उस रात शिरीष के कानों में बार बार वनिता की आवाज़ गूंजती रही। कितनी अर्थहीन और बेबुनियाद लग रही थीं वो सारी बातें जो उसने वनिता के बारे में सुनी थीं...

आधुनिका : story of a working woman अध्याय 1 ये शादी नहीं हो सकती

कामकाजी लड़कियों को लेकर समाज में कई तरह की धारणाएं बनी हुई हैं। यह कहानी उसका खंडन करने का एक छोटा सा प्रयास है। इस कहानी के पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं पर वास्तविकता से कहीं न कहीं प्रेरित हैं।                        अध्याय 1 ये शादी नहीं हो सकती वनिता ने फ़ोन उठाया और इससे पहले कि उसका इरादा बदल जाए, उसने कॉल बटन दबा दिया। फोन की घंटी बजते बजते थक कर बंद होने ही वाली थी कि शिरीष की झुंझलाई हुई Hello' उसके कानों में पड़ी और एक बार फिर उसकी आँखों में आंसू छलक आए। पिछले कुछ दिनों से उसकी आंखें वक़्त बेवक़्त बरसती ही रहती थीं। किसी तरह खुद पर काबू पाकर वनिता ने कहा 'क्या ये तुम्हारा अंतिम निर्णय है?' शिरीष फट पड़ा ' हां! ये मेरा अंतिम निर्णय है। ये शादी नहीं हो सकती। तुम मेरे घरवालों को ज़रा भी पसंद नहीं हो और सच कहूं तो मुझे भी। तुम ऐसी लड़की हो ही नहीं जो किसी का घर सजा सके। तुम तो बस अपने होठों पर मुस्कान सजा कर रोज़ काम पर निकल जाती हो। पीछे छूटे घर से बेपरवाह। मां ने तो पहले ही कहा था कामकाजी लड़कियों से दूर रहने के...